सहमी सी हवा ने
जब प्रांगन में कदम रखा
तब कुछ अनजानापन था, और
कुछ रुढ़िवादी दीवारों की बंदिशें
उस प्रांगन में कोई और भी था
ऊँचाइयों के साथ अकेला
इन्हीं ऊँचाइयों ने
दीवारों को बौने होने का एहसास कराया
हवाओं को
पुनः उन्मुक्त आकाश दिलाया
और, हवाएं बहने लगी
ऊँचाइयों को छूकर, एक ठंडी हवा देकर
वो भूल गया
अपनी वास्तविकता को,
सोचा- मानसिकता बदल गयी है
शायद इसलिए
उंचाइयां धरातल से मिल गयी है
पर सच्चाई इससे परे थी
वो हलकी ठंडी छुअन जो
ऊँचाइयों को बहुत भायी थी
उससे तो हवाओं ने
केवल हमदर्दी जताई थी
हमदर्दी इसलिए कि
उंचाइयां मृत होती है
जहाँ संवेदना नहीं होती, एहसास नहीं होते
बस कदमों के निसान होते है, ज़िन्दगी की आस नहीं होती
बस ऊँचाइयों की धरातल से
इतनी ही दूरी है
और इसे मानना
ऊँचाइयों की नियति ही नहीं
मजबूरी भी है
1 comment:
nice poem....i liked it very much ..
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