Tuesday, June 13, 2023

वो बीतें लम्हे....

मेरी हर राह की सांसें
मंजिल से पहले
दम तोड़ जाती है, और
छोड़ जाती है
कुछ अधूरे, टीस देने वाले
ख़्वाबों की पंक्तियाँ

पर,
ये ख्वाब उन मंजिलों से तो अच्छी हैं
हमेशा साथ तो निभाती है
वरना ये भ्रामक मंजिलें तो
पूर्णता का साहस ही नहीं दिखाती है

अधूरी राहें तो अधूरे ख्वाब ही देते है
जो मानस पटल से
फिर भी मिटाई जा सकती है
पर मृगतृष्णा सी मंजिलों से
उत्पन्न उन स्तिथियों का क्या
जो अस्तित्व को ही अधूरा बनाती हैं