Tuesday, June 13, 2023

एक कवि का अभ्युदय!!!!!!

जब सरकार हुई अत्यधिक दानी
और कविओं को मिलने लगे सम्मान
तो मैंने भी कविता लिखने की ठानी
बस ! यहीं से शुरू होती है मेरे दुर्भाग्य की कहानी

जवानी का खून गर्म था,
सोचा, वीर रस की कविताओं पर
दिमाग आजमाऊँ
कविता के लिए न सही,
देशभक्ति के लिए पुरस्कार पाऊँ !
कविता लिखी,
जब देशभक्त कवि सम्मलेन में सुनाया,
तो थोड़ी देर बाद अपने को अस्पताल में पाया
सुबह अखबार पढ़ा तो पता चला
लोगों ने मार मार कर मेरा सर फोड़ा था
क्यूंकि कविता में देश प्रशंसा करते वक़्त
मैंने 'भारत' की जगह 'पाक' जोड़ा था !!

मैंने हिम्मत नहीं हारी
सोचा- चलो इसी बहाने अखबार में
मेरा नाम तो आया
पुरस्कार न सही, दुत्कार ही सही
मैंने कुछ तो पाया
नफरत से ही प्रेम बढेगा
मेरा पलड़ा कभी तो भारी पड़ेगा!!
अब तो कविता मेरे दिन में थी, मेरे रात में थी
मेरे मुंह से निकली हर बात में थी
जैसे ही घर से बाहर निकला,
एक सज्जन ने पूछा- अभी समय क्या है?
मैंने कवि के अंदाज़ में पूछा- समय की पूछते हो!!
अरे, ज़िन्दगी समय के बिना अधूरी है
जैसे चटनी के बिना पकौड़ी है
धुएं के बिना आग है
फूल के बिना बाग़ है
जैसे कैदी के बिना जेल है
और सवारी के बिना रेल है
जैसे कहानी के बिना नानी है
उसी तरह समय व्यक्ति की जिंदगानी है!!
मैंने देखा- वो व्यक्ति मुझे घुर रहा है,
और अगले ही पल सडक पर दौड़ रहा है
मैंने चिल्ला कर कहा- अजी सुनते हो
जवाब आया- साले, पागल, कवि बनते हो !!

मेरे दिल को पागल शब्द सुनकर ठेस लगी
मेरे दिमाग में विचार आया-
अपनी कवितायें सारी दुनिया को सुनाता हूँ
कोई तो मुझे पहचानेगा
मेरी कविताओं का मूल्य जानेगा!
मैं घर के बाहर चिल्लाने लगा-
कविता मेरी जान है, जिंदगानी है
मेरे दिल के खाली बोतल का पानी है
अब चाहें पागल कहे मुझे सारा जमाना
केवल कविता की कुटिया में ही है धुनी रमाना
तभी,
मेरी पीठ पर
किसी ने कस कर चपत लगाई
मैंने पलट कर देखा तो
वो मेरी पड़ोसन कविता का था भाई
मैं उसे 'अपनी कविता' और 'उसकी कविता' का अंतर न समझा पाया
और
हाथ, लात, डंडे, अंडे, और न जाने
कितने ही अत्याधुनिक शास्त्रों से मार खाया
उसने मुझे गधे पे बिठाकर घुमाया
पर मेरे दिमाग से
कविता का भुत न उतरवा पाया !!!

यादों के झरोखे से !!!

आज महसूस हुआ है
पीछे छूटने का दर्द,
अभिलाषाओं और क्षण क्षण संवारी गयी यादों के
टूटने का दर्द,
दर्द इसलिए नहीं कि
मैंने कभी दर्द सहा नहीं
बल्कि इसलिए कि
दर्द ने दिल में आकर भी कुछ कहा नहीं

फर्क केवल इतना है,
पहले वो मेरे कल्पनाओं का हिस्सा था
अब शायद मेरी यादों का
दुःख ये नहीं की
वो खुश है
दुःख इस बात का है कि
इस ख़ुशी में हम नहीं है

रिश्तों की परिभाषाएं बदल गयी है
आयाम बदल गए है
नजदीकियों के अर्थ बदल गए है
बस,
किसी कोने में छूट गया
चिर-स्थिर सा खड़ा
नहीं बदल सका हूँ मैं

अधूरी कविता!!

'साथ देने' और 'साथ होने' में
अंतर है- शब्दों का या,
इससे आगे अर्थ का

'साथ देना' एहसान है
जो दूरियों को जतलाता है
'साथ होना' एहसास है
जो नजदीकियों से आता है

शब्दों के इसी भ्रमजाल में उलझा
मैं सोचता हूँ
कभी कभी एक शब्द
जो बुनियाद तय करता है
रिश्तों की,
और बेशक ज़िन्दगी की,
को हम समझ नहीं पाते
या
समझना नहीं चाहते

हजारों ख्वाहिशें ऐसी....

सहमी सी हवा ने
जब प्रांगन में कदम रखा
तब कुछ अनजानापन था, और
कुछ रुढ़िवादी दीवारों की बंदिशें

उस प्रांगन में कोई और भी था
ऊँचाइयों के साथ अकेला
इन्हीं ऊँचाइयों ने
दीवारों को बौने होने का एहसास कराया
हवाओं को
पुनः उन्मुक्त आकाश दिलाया

और, हवाएं बहने लगी
ऊँचाइयों को छूकर, एक ठंडी हवा देकर
वो भूल गया
अपनी वास्तविकता को,
सोचा- मानसिकता बदल गयी है
शायद इसलिए
उंचाइयां धरातल से मिल गयी है

पर सच्चाई इससे परे थी
वो हलकी ठंडी छुअन जो
ऊँचाइयों को बहुत भायी थी
उससे तो हवाओं ने
केवल हमदर्दी जताई थी

हमदर्दी इसलिए कि
उंचाइयां मृत होती है
जहाँ संवेदना नहीं होती, एहसास नहीं होते
बस कदमों के निसान होते है, ज़िन्दगी की आस नहीं होती

बस ऊँचाइयों की धरातल से
इतनी ही दूरी है
और इसे मानना
ऊँचाइयों की नियति ही नहीं
मजबूरी भी है

ज़िन्दगी, मौत और मैं

अतिरेक आनंद से भरी
ज़िन्दगी को
जब मौत ने अपने सामीप्य का एहसास कराया
तो पहली बार
ज़िन्दगी का वास्तविक अर्थ समझ में आया
जीवन कर्म का दूसरा नाम है
और मौत,
कर्मो के यथार्थ को बतलाती है
जीवन जीने की कला सिखलाती है

मौत ने अचानक
जब जीवन के आँगन में दस्तक दी,
तो शक हुआ
जीवन की परिपुर्नता पर
महसूस हुआ
ज़िन्दगी वास्तव में अभी अधूरी है
क्यूँकी हजारों के अपेक्षाओं की दीवार
इसी जीवन की नींव पर खड़ी है

और मौत
शायद यही एहसास दिलाना चाहती थी
चली गयी रणक्षेत्र पर छोड़कर
एक क्षणिक मौका देकर
ताकि
ऋण बोझ से मुक्त हो सकूँ
'ज़िन्दगी' के दो क्षण जी सकूँ
लेकिन,
समय की सीमाएं रेखित है
और इंतज़ार हो रहा है.............

मैं बड़ा हो गया हूँ!

हर रात
सूनी हवाओं के मध्य
मूक पत्थर पर बैठा मैं
सोचता हूँ-
मैं बड़ा हो गया हूँ!

आधे अधूरे इतिहास के
बिखरे शब्द,
जो जीवन के पतझर में
धुंधले हो गए थे
बहारों के मौसम में
उन्हें पुनः उकेरता हूँ!
मैं बड़ा हो गया हूँ!!

भ्रमित राहें और
दिशाविहीन सा मैं
अनगिनत आकांक्षाओं का भार लिए
अधजगी रातें और प्रयासरत दिन
आँखों में विश्वास के दिए
इन्ही 'यादों' को आज याद करता हूँ!
मैं बड़ा हो गया हूँ!!

लेकिन
क्या मैं बड़ा हो गया हूँ?
नहीं है अब
मित्रों की हमजोली, आधी रात की हंसी-ठिठोली
प्यार और तकरार के किस्से
'उसका' साथ, अधूरी बात
एक्साम्स- यार, अभी बची है एक रात

जानता हूँ,
राहें बजरी की थी, अब पक्की हो गयी है
पर साथ ही
संकरी और सुनसान भी
शायद
मैं सचमुच 'बड़ा' हो गया हूँ!!

क्षणिक संवाद

बदलाव का आशिक था मैं
अब नफरत सी हो गयी है
कुछ कर गुजरने की होड़ में
ज़िन्दगी बस सो गयी है

जीता तो मैं कल भी था
जी मैं आज भी रहा हूँ
पर इस गर्मी के मौसम में
बारिश की बूँदें गड़ गयी है

चला था इतिहास बनाने
आज इतिहास के पन्नो पे खड़ा हूँ
और वर्त्तमान गवाह है
अब तो सर्दियों में भी लू चल रही है

पंख फैला दिए है समय ने
सब कुछ समेटने में लगा है
पहले तो राहें ही ढूँढता था
अब मंजिलें भी खो गयी है

वो बीतें लम्हे....

मेरी हर राह की सांसें
मंजिल से पहले
दम तोड़ जाती है, और
छोड़ जाती है
कुछ अधूरे, टीस देने वाले
ख़्वाबों की पंक्तियाँ

पर,
ये ख्वाब उन मंजिलों से तो अच्छी हैं
हमेशा साथ तो निभाती है
वरना ये भ्रामक मंजिलें तो
पूर्णता का साहस ही नहीं दिखाती है

अधूरी राहें तो अधूरे ख्वाब ही देते है
जो मानस पटल से
फिर भी मिटाई जा सकती है
पर मृगतृष्णा सी मंजिलों से
उत्पन्न उन स्तिथियों का क्या
जो अस्तित्व को ही अधूरा बनाती हैं

दोस्ती

दोस्ती,
एक ऐसे पवित्र बंधन का नाम है
जिसकी मर्यादाएं सीमित है,
लेकिन इस रिश्ते के आइने में
केवल प्यार प्रतिबिंबित है

दोस्ती,
भावनाओं के सागर का
सरल आयाम है
दोनों किनारे इसकी सरलता को
स्थायित्व दे
दोस्ती इसी अपेक्षा का दूसरा नाम है

मुस्कान :)

'मुस्कान'
मेरे जीवन के कुछ अनछुए पलों में से
एक ख़ूबसूरत सा पल
मैं आँखें बंद करके उस पल की
रह तकता हूँ, और
उस पल की खूबसूरती को
महसूस करता हूँ

'मुस्कान'
सम्पूर्णता का भाव है
मेरे स्वपन की
या, शायद मेरे जीवन की
और ख़ुशी का बोध
किसी चीज़ को पाने की
या, किसी क्षण के एहसास की

अनेकता में एकता!!

एक गहन चिंतन के बाद
मैंने
पिताजी से पूछा-
'ये विविधता में एकता क्या है?'
पिताजी ने
मैदान की तरफ इशारा किया
मैंने देखा
साथ खेल रहे दो बच्चे,
धूल-धूसरित
और
बिलकुल एक जैसे होने का भ्रम
असंतुष्ट निगाहों से मेरा एक और प्रश्न-
'ये क्या है?'
पिताजी ने बताया-
एक का बाप दुसरे के कर्ज तले
तीस सालों से दबा है
और कभी भी मर सकता है,
यही विविधता में एकता है!

मुंबई, बस एक शहर!

बढती ख्वाहिशों के साथ 
एक सिमटता शहर,
अधूरे सपनों के साथ 
एक जुडती डगर
मुंबई, बस एक शहर!

सुबह के सपने जब भीड़ में 
खो जाते है, 
स्क्वायर फीट के घरों में
दम तोड़ जाते है,
शाम के धुंधलके में उन्ही सपनों को
ढो कर हम घर आते है
इस इंतज़ार में-
कि है अभी एक और पहर 
मुंबई, बस एक शहर!

गगनचुम्बी इमारतें जब भी बौने होने का 
दंश दे जाते है
तब,
लोकल में रखे हर बैग में आतंक ढूँढ़ते 
कुछ मजबूत इरादे
हमारा हौसला बढ़ाते है,
और, बारिश की बूँदें यहाँ
काट जाती है सारे जहर 
मुंबई, बस एक शहर

यहाँ समंदर के किनारों पे
केवल कहानियाँ जन्म लेती है पर इतिहास 
कभी नहीं बनते
और, शुन्य की तरफ भागते ये पैर 
कभी नहीं थमते.
समझने की कोशिश में हूँ कि-
अकाल है समय का या आने वाला है 
प्रकृति का कोई कहर 
मुंबई, बस एक शहर!