हर रात
सूनी हवाओं के मध्य
मूक पत्थर पर बैठा मैं
सोचता हूँ-
मैं बड़ा हो गया हूँ!
आधे अधूरे इतिहास के
बिखरे शब्द,
जो जीवन के पतझर में
धुंधले हो गए थे
बहारों के मौसम में
उन्हें पुनः उकेरता हूँ!
मैं बड़ा हो गया हूँ!!
भ्रमित राहें और
दिशाविहीन सा मैं
अनगिनत आकांक्षाओं का भार लिए
अधजगी रातें और प्रयासरत दिन
आँखों में विश्वास के दिए
इन्ही 'यादों' को आज याद करता हूँ!
मैं बड़ा हो गया हूँ!!
लेकिन
क्या मैं बड़ा हो गया हूँ?
नहीं है अब
मित्रों की हमजोली, आधी रात की हंसी-ठिठोली
प्यार और तकरार के किस्से
'उसका' साथ, अधूरी बात
एक्साम्स- यार, अभी बची है एक रात
जानता हूँ,
राहें बजरी की थी, अब पक्की हो गयी है
पर साथ ही
संकरी और सुनसान भी
शायद
मैं सचमुच 'बड़ा' हो गया हूँ!!
2 comments:
Lovely Poem dear.
Shayad hum sab bade ho gaye hain !!
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